संसार ताप से तप्त जीवों में शांति का संचार करने वाले, अनादिकाल से अज्ञान के गहन अन्धकार में भटकते हुए जीवों को ज्ञान का प्रकाश देकर सही दिशा बताने वाले, परमात्म-प्राप्तिरूपी मंजिल को तय करने के लिए समय-समय पर योग्य मार्गदर्शन देते हुए परम लक्ष्य तक ले जाने वाले सर्वहितचिंतक, ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की महिमा अवर्णनीय है।

वे महापुरुष केवल दिशा ही नहीं बताते वरन् चलने के लिए पगडंडी भी बना देते हैं, चलना भी सिखाते हैं, उंगली भी पकड़ाते हैं और हम उनकी उंगली अगर छोड़ भी दें तो करुणा-कृपा की वृष्टि करते हुए वे हमें ऊपर भी उठा लेते हैं। जैसे माता-पिता अपने बालक को कन्धे पर उठाकर यात्रा पूरी करवाते हैं वैसे ही वे कृपालु महापुरुष हमारी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण कर देते हैं। माता-पिता की तरह कदम-कदम पर हमारी संभाल रखने वाले, सर्वहितचिंतक, समता के सिंहासन पर बैठाने वाले ऐसे विरल संतों को लाख-लाख वंदन….

ऐसे महापुरुषों की कृपा से जीव रजो-तमोगुण के प्रभाव से छूटकर ऊर्ध्वगामी होता है, जिज्ञासुओं की ज्ञान-पिपासा तृप्त होने लगती है, जपियों का जप सिद्ध होने लगता है, तपियों का तप फलने लगता है, योगियों का योग सफल होने लगता है। ऐसे महापुरुषों के प्रभाव से समग्र वातावरण में पवित्रता, उत्साह, सात्त्विकता एवं आनंद की लहर छा जाती है। इतना ही नहीं, वरन् उनकी संतरूपी शीतल गंगा में अवगाहन करके जीव के त्रितापों का शमन हो जाता है एवं वह जन्म-मरण की शृंखला से छूट जाता है।

अपने स्वरूप में जगे हुए ऐसे महापुरुषों की करुणामयी शीतल छाया में संसार के दुःखों से ग्रस्त जीवों को परम शांति मिलती है। उनके प्रेम से परिपूर्ण नेत्रों से अविरत अमीमय वृष्टि होती रहती है। उनकी अमृतमयी वाणी जीवों के हृदय में आनंद एवं माधुर्य का संचार करती है। उनके पावन करकमल सदैव शुभ संकल्पों के आशीर्वाद देते हुए अनेकों पतितों को पावन कर देते हैं। उनकी चरणरज से भूमि तीर्थत्व को प्राप्त कर लेती है। उनकी कृपादृष्टि में आने वाले जड़ पदार्थ भी जब कालांतर में जीवत्व को मिटाकर ब्रह्मत्व को प्राप्त कर लेते हैं तो मनुष्य की तो बात ही क्या? किंतु ऐसे महापुरुष हजारों में तो कहाँ, लाखों-करोड़ों में भी विरले ही होते हैं।

भगवान श्री कृष्ण ने भगवदगीता में कहा भी हैः

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।

‘बहुत जन्मों के बाद तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी पुरुष ‘सब कुछ वासुदेव ही है’ – इस प्रकार मुझको भजता है। वह महात्मा अति दुर्लभ है।’

(गीताः 7.19)

ऐसे ब्रह्माकार वृत्ति में स्थित हुए महात्माओं के दर्शन की महिमा का वर्णन करते हुए संत कबीर ने कहा हैः

अलख पुरुष की आरसी साधु का ही देह।

लखा जो चाहे अलख को इन्हीं में तू लख ले।।

‘परमात्मा के साथ एकरूप हो गये ब्रह्म-साक्षात्कारी महापुरुष की देह एक दर्पण के समान है, जिसमें आप अलख पुरुष (परमात्मा) के दर्शन कर सकते हो।’

गुरु नानक जी ने भी संतो की महिमा का वर्णन करते हुए कहा हैः

संत की महिमा वेद न जाने।

जेता जाने तेता बखाने।।

संसार का सच्चा कल्याण संतों के द्वारा ही हो सकता है। ऐसे महापुरुषों का पूरा जीवन ही बहुजनहिता बहुजनसुखाय‘ होता है। संसार के जीवों को पाप में से पुण्य की तरफ, असत् में से सत् की तरफ, अन्धकार में से प्रकाश की तरफ एवं नश्वर में से शाश्वत की तरफ ले जाने वाले संतों के दिव्य कार्य एवं उपदेशों का अनुसरण करने से साधक के जीवन में संयम, सदाचार, साहस, शक्ति, उत्साह, प्रसन्नता जैसे अनेक दैवी गुणों का विकास होता है।

जब-जब समाज में से संयम, सदाचार, सत्य, नीति आदि लुप्त होने लगते हैं एवं मनुष्य अपने अमूल्य जीवन को विषय-विकारों में ही गँवाने लगता है तब-तब इस धरा पर संतों का अवतरण होता है। वैसे तो अलग-अलग समय में अन्य देशों में भी सूफी फकीरों, पैगंबरों या प्रभु के प्यारे भक्तों ने अपनी करुणा कृपा से मानवकल्याण के लिए निःस्वार्थ कर्म किये हैं, फिर भी यह भारत भूमि इस विषय में विषय भाग्यशाली रही है। जब स्वामी विवेकानन्द ने अपनी पहली अमेरिका की यात्रा के बाद सन् 1896 में स्वदेशगमन किया तब एक पत्रकार ने उन्हें एक खूब ही सीधा एवं सरल प्रश्न पूछाः

“स्वामी जी ! आप पाश्चात्य जगत की प्रगति, विकास एवं विज्ञान सभी देखकर आये हैं तो अब भारत के लिए आपकी धारणा कैसी बनी है?”

पत्रकार को ऐसा ख्याल था कि स्वामी जी भारत के विषय में कुछ घटिया बोलेंगे। किन्तु स्वामी विवेकानंद ने खूब दृढ़तापूर्वक जवाब दियाः

“साढ़े तीन वर्ष पूर्व जब मैंने विदेश प्रस्थान किया था तब मैं भारत को मात्र अपना देश, अपनी मातृभूमि समझता था और अब, जब मैं अमेरिका जाकर वहाँ के समाज एवं जीवन-पद्धति को देखकर आया हूँ तो अब भारत मेरे लिए केवल मेरा देश या मेरी मातृभूमि ही नहीं बल्कि एक दिव्य भूमि, देवभूमि, पवित्र भूमि, पूजनीय भूमि बन गयी है। यह धरा प्राचीन युग से ही संत-परंपरा से सुशोभित है।”

ऐसी ही पावन भूमि एवं ज्ञानी महापुरुषों की महिमा का वर्णन करते हुए ‘नारदभक्तिसूत्र’ में लिखा हैः

तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि, सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि

सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।।69।।

‘(ज्ञानी) तीर्थों को तीर्थत्व प्रदान करते हैं, कर्मों को पावित्र्य प्रदान करते हैं, शास्त्रों को शास्त्रत्व प्रदान करते हैं।’ ज्ञानी जहाँ रहते हैं वह देश भी पुण्यतीर्थ बन जाता है। उनका उपदेश शास्त्र बन जाता है एवं उनके कर्म सत्कर्म बन जाते हैं।

ऐसे ही महापुरुषों के प्रेरणात्मक जीवनचरित्र की महिमा का बयान करते हुए महात्मा दादू के शिष्य संत सुंदरदास ने कहा हैः

“भगवान के दर्शन करने पर भी संदेह पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता, किन्तु भगवान की कथा सुनने से भगवान में श्रद्धा बढ़ती है और उसकी अपेक्षा भी भगवद् प्राप्त महात्माओं का जीवनचरित्र एवं सत्संग पढ़ने तथा सुनने से भक्ति का प्रागट्य शीघ्र हो जाता है।”

नारेश्वरवाले श्री रंगअवधूतजी महाराज ने भी अपने जीवन पर पड़े हुए, संतों के जीवनचरित्र के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा हैः

“मुझे संतों का जीवनचरित्र पढ़ना अभी भी बहुत अच्छा लगता है। संत अर्थात् जिनके जन्म-मरण के चक्र का अंत हो गया हो, जिनके सत्संग के ज्ञान से हमारे जन्म-मरण का अंत हो जाता है… कर्त्तापने के भाव का अंत आ जाता हो- ऐसा ज्ञान देनेवाले को संत कहते हैं। संतों के जीवनचरित्रों ने ही मुझे भगवद् प्राप्ति की प्रेरणा दी थी।”

ऐसी जीवन्मुक्त महाविभूतियों के लिए श्री अर्जुनदेव ने गाया हैः

आपि मुकतु मुकतु करै संसारु।

नानक तिसु जन कउ सदा नमसकारू।।

केवल प्राचीन समय में ही संत-महापुरुषों का अवतरण हुआ हो ऐसी बात नहीं है। अर्वाचीन समय में भी आध्यात्मिक ऊँचाईवाले अनेक संत, ऋषि, महर्षि हो गये हैं। उन्हीं में से एक थे विश्ववंदनीय प्रातः स्मरणीय श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज। उन्होंने सत्-चित्-आनंद की पराकाष्ठास्वरूप परमानंद को पाया था एवं अनेक साधकों को इसी दिशा की ओर मोड़ा था। उनका जीवन पृथ्वी के समस्त जीवों के लिए दिव्य प्रेरणास्रोत था। उनकी प्रत्येक चेष्टा समष्टि के हित के लिए ही थी। उनके दर्शनमात्र से प्रसन्नता उत्पन्न हो जाती थी, निराशा के बादल छँट जाते थे, हताश हुए लोगों में उत्साह का संचार हो जाता था एवं उलझे हुओं की उलझनें दूर होकर उनमें नयी चेतना छा जाती थी। उनका सम्पूर्ण जीवन ही मानो निष्काम कर्मयोग का मूर्तिमंत स्वरूप था।

लोगों के जीवन में से लुप्त होते धार्मिक संस्कारों को पुनः जगाने के लिए, संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए एवं सोयी हुई आध्यात्मिकता में पुनः प्राण फूँकने के लिए वे आजीवन कार्यरत रहे। उनकी प्रार्थना ही विश्वकल्याण की भावना की द्योतक हैः

‘हे भगवान ! सबको सदबुद्धि दो…. शक्ति दो…. आरोग्यता दो… हम सब अपना-अपना कर्त्तव्य पालें एवं सुखी रहें….’

लाखों-लाखों माँ सरस्वती जी भी एकत्रित होकर जिनकी महिमा का वर्णन नहीं कर सकतीं ऐसे ब्रह्मनिष्ठ, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष, वेदान्त के मूर्तिरूप श्री लीलाशाहजी महाराज के संदर्भ में कुछ भी लिखना मात्र बालचेष्टा ही है। उनकी दिव्य लीला वर्णनातीत है, शब्दातीत है। उनके अलौकिक व्यक्तित्व को शब्दसीमा में बाँधना असंभव है। वामन भला विराट को कैसे नाप सकता है? गागर में पूरा सागर कैसे समा सकता है?

विशाल महासागर में से मात्र एक बूँद की झलक दिखाने के सिवा और क्या हो सकता है? उनका चरित्र इतना विशाल, गहन एवं उदार है कि उनके विषय में कुछ भी कहना या लिखना उनकी विशालता को मर्यादित कर देने जैसा लगता है।

फिर भी…. अंतर में केवल श्रद्धा रखकर ही गुह्य ब्रह्मविद्या के मूर्तिमंत स्वरूप पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज के जीवन के प्रेरक प्रसंगों एवं जिज्ञासुओं के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली सत्संग-कणिकाओं को यहाँ यथाशक्ति प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास किया जा रहा है।