15 जून 1950, नैनिताल।

एक लड़के को उसके पिता ने कहाः

“अन्दर कमरे में जाकर जाँच कर कि वहाँ कितने व्यक्ति सत्संग सुनने के लिए बैठे हैं और कितने लोग उपदेश दे रहे हैं।”

वास्तव में तो एक ही उपदेशक और 50 सत्संगी बैठे थे। वे जिस कमरे में बैठे थे उसके चारों ओर की दीवारों में काँच लगे हुए थे। लड़के ने सभी मनुष्यों को देखा, परन्तु उसके साथ-साथ काँच के अन्दर उन लोगों के प्रतिबिम्ब भी देखे। गिनती करके वह अपने पिता के पास गया और बोलाः

“पिताजी ! दो उपदेशक और सौ सत्संगी बैठे हैं।”

उसके पिता तो सत्य हकीकत जानते ही थे, परन्तु कुछ बोले नहीं। जब सत्संगी चले गये और कमरा खाली हो गया तब पिता बेटे को लेकर अन्दर गये और कहने लगेः

“देख, अन्दर कितने लड़के हैं?”

बेटे ने जवाब दियाः “दो।”

उसके पिता ने कहाः “जा, दूसरे लड़के को यहाँ बुला ला।”

बेटे ने जाकर दूसरे लड़के को पकड़कर लाने की खूब कोशिश की परन्तु दूसरा लड़का वहाँ हो तो पकड़ लाए ना !

अन्त में उसने काँच को जोर से धक्का मारा तो काँच टूट गया और दिखता हुआ दूसरा लड़का भी गायब हो गया। उसने जाकर पिता से कहाः

“मैं ही था, दूसरा कोई लड़का नहीं था।”

तब पिता ने उसे समझायाः

“दूसरा लड़का कोई नहीं था, तू ही था। काँच में तेरा ही प्रतिबिम्ब दिख रहा था। जो उपदेशक भी तुझे दो दिखे वे भी दो न थे और सत्संगी भी सौ न थे, परन्तु उन लोगों के प्रतिबिम्बों को तूने काँच में देखा इसीलिए तुझे सब दुगने दिखे।”

इसी प्रकार इस संसार में भी यह सब एक का ही प्रतिबिम्ब है। तुमसे भिन्न कोई दूसरी वस्तु नहीं है, परन्तु शरीर को ‘मैं’ मानने की भ्रान्ति के कारण यह सब विविधता दिख रही है।

एक बार उल्लुओं की पंचायत इकट्ठी हुई। उन लोगों ने एक दूसरे से पूछाः

“तुममें से किसी ने सूर्य को देखा है?”

भला उनमें से किसी ने सूर्य को देखा हो तो ‘हाँ’ कहे न ! उन लोगों ने निश्चय किया कि सूर्य जैसा कुछ है ही नहीं। ऐसी ही दशा अज्ञानी जीवों की है। वे लोग भी ईश्वर के लिए कहते हैं- “ईश्वर जैसा कुछ नहीं है।”

वे लोग इस जगत को ही सत्य समझ रहे हैं।

अपने आपको भूल के हैरान हो गया।

माया के जाल में फँसा वैरान हो गया।।

अनुक्रम

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ज्ञानी का जलकमलवत् जीवन

31 जनवरी 1955आगरा।

सत्संग के समय एक भक्त ने पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू से पूछाः “स्वामी जी ! ज्ञानी को संसार स्वप्न जैसा कैसे लगता है? संसार यदि स्वप्न जैसा लगता है तो वे व्यवहार किस प्रकार करते हैं?

पूज्य बापू ने कहाः

“बेटा ! ज्ञानी का कर्म कर्त्तव्यबुद्धि से नहीं होता वरन् सहजबुद्धि से होता है। सहज एवं शुद्ध बुद्धि में संसार स्वप्न जैसा लगता है और उसका अनुभव होता है फलतः कर्म उन्हें बन्धनरूप नहीं होते। इसीलिए ज्ञानी को संसार स्वप्न जैसा लगता है।

ज्ञानी सदा कमल के फूल की तरह निर्लेप रहते हैं। जिस प्रकार खरबूजा बाहर से अलग-अलग फाँक वाला दिखता है परन्तु अन्दर से एकरस होता है उसी प्रकार दुनिया में रहने पर भी ज्ञानी का व्यवहार बाहर से अलग-अलग दिखता है, परन्तु अन्दर से वे एकरस होते हैं। वे देह को अनित्य और आत्मा को नित्य जानते हैं। ‘यह जगत मेरा आत्मस्वरूप ही है। इस जगत में राग या द्वेष करने जैसा कोई पदार्थ नहीं है…. ‘ऐसे अद्वैतभाव में वे स्थित होते हैं।

ज्ञानी संसार में रहते हुए भी संसार में नहीं होते। बाहर से कर्त्ता दिखते हैं परन्तु अंदर से अकर्त्ता, अभोक्ता भाव में स्थित होते हैं।

सुखु दुखु दोनों सम करि जानै अउरु मानु अपमाना।

हरख सोग ते रहे अतीतातिनि जगि ततु पछाना।।

जिस प्रकार वैज्ञानिक समझते हैं कि सिनेमा के दृश्य परदे के ऊपर पड़ने वाले प्रकाश से ज्यादा कुछ नहीं हैं उसी प्रकार ज्ञानी भी समझते हैं कि यह जगत भी कल्पित है और आत्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी सत्य नहीं है। शरीर के प्रारब्ध के अनुसार ज्ञानी सभी कर्म करते हुए दिखते हैं, परन्तु उनमें कर्त्तापने और भोक्तापने का भाव नहीं रहता। इन्द्रियाँ खुद ही कर्म करती हैं – ऐसा मानकर ज्ञानी महापुरुष वैराग्ययुक्त रहते हैं। सोना, जागना, खाना, पीना, उठना, बैठना घूमना, देखना, स्पर्श करना, सूँघना, सुनना वगैरह क्रियाओं मे अज्ञानी की तरह वे बँध नहीं जात। क्योंकि ज्ञानी उन-उन विषयों में इन्द्रियों को ही भोग कराते हैं और खुद साक्षी रूप रहकर उन विषयों का भोग नहीं करते, ठीक वैसे ही कि जैसे आकाश सर्वत्र है फिर भी उसे जल का स्पर्श नहीं होता और वायु सब जगह बहती है फिर भी कहीं रुकती नहीं। उसी प्रकार ज्ञानी प्रकृति में रहते हुए भी उसमें आसक्त नहीं होते। जिस प्रकार स्वप्न में से जाग्रत अवस्था में आया हुआ मनुष्य स्वप्न में देखे हुए प्रपंच से अपने को निर्लेप जानता है उसी प्रकार वैराग्य से तीक्ष्ण बनी हुई बुद्धिवाले एवं निर्गुण ब्रह्मविद्या से छेदे हुए संशयोंवाले ज्ञानी भी देहादिक प्रपंचो से अपने को निर्लेप जानते हैं। ज्ञानी के प्राण, इन्द्रियाँ, मन तथा बुद्धि की वृत्तियाँ संकल्परहित हो जाती हैं। वे देह में रहते हुए भी देह के गुणों से मुक्त होते हैं।

जगत का कल्याण करने के लिए अनेक प्रकार के कर्म करते हुए भी जीवन्मुक्त कर्मों से लेपायमान नहीं होते। अनेकों के परिचय में आते हुए भी वे पूर्णतः निर्लेप रहते हैं। वस्तुओं से उन्हें राग नहीं होता। नित्य, निरन्तर उनका चित्त परमात्मा में ही स्थित रहता है। इस जगत को वे मिथ्या मानते हैं। वे भविष्य का विचार नहीं करते और न ही वर्त्तमान के पदार्थों में विश्वास रखते हैं। इसी प्रकार भूतकाल के चिन्तन में भी नहीं रहते। निद्रा अवस्था में भी उनका चित्त योगनिद्रा में होता है। जाग्रत अवस्था में भी मानो निर्विकल्प समाधि की अवस्था में निमग्न रहते हैं। कोई भी पदार्थ, व्यक्ति या प्रसंग से उन्हें हर्ष या शोक नहीं होता। जिस प्रकार पालने में सोता हुआ बालक मन के अनुसंधान के सिवाय भी हाथ-पैर हिलाने की चेष्टा करता है उसी प्रकार ज्ञानी महापुरुष बाह्य अंगों से सभी चेष्टाएँ करते हैं परन्तु उन चेष्टाओं में उनका चित्त संलग्न नहीं होता।”

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सावधान नर सदा सुखी

15 जून 1947नैनिताल।

एक साधक ने प्रश्न कियाः

“महाराज जी ! साधनाकाल के दौरान साधक को कौन-कौन सी सावधानी रखनी चाहिए?”

पूज्य बापू ने एक छोटा-सा उदाहरण देते हुए कहाः

“एक बार सागर में नाव चलाने वाले खलासी लोग अपने मुखिया के पास गये और अपनी बड़ाई हाँकने लगेः

‘देखो मुखिया जी ! हम लोग कितने साहसी और होशियार हैं कि वीरतापूर्वक भँवरों तक भी नाव को ले जाते हैं और भँवरों को पार करके सुरक्षित वापस आ जाते हैं। परन्तु यह जो भीमा है न, वह बहुत डरपोक है। यह तो नाव लेकर इस प्रकार भँवरों की ओर जाता ही नहीं है। कितना बुद्धु है?’

अनुभवी मुखिया ने जवाब दियाः

‘तुम लोग भले ही भँवरों को पार करके आ जाते हों, परन्तु तुम्हारी अपेक्षा तो यह भीमा ज्यादा होशियार है। यह ऐसी भयानक जगह पर जाता ही नहीं कि जहाँ जिन्दगी जोखिम में हो। तुम लोग वहाँ जाते हो तो कभी ऐसे फँस जाओगे कि वापस आ ही नहीं सकोगे। नाव सहित सागर की गहराई में खो जाओगे। भीमा तो ऐसे किसी खतरे में पड़ता ही नहीं है।’

इस प्रकार सन्मार्ग के पथिकों को भी विषय-विकारों से दूर रहना चाहिए। जो विषय विकारों से दूर रहते हैं वे लोग भाग्यवान हैं और गृहस्थ आश्रम में रहकर भी जो उनसे दूर रहते हैं वे लोग ज्यादा प्रशंसनीय हैं। विषय-भोगों को भोगते-भोगते लोग विषय-भोगों को मक्खन एवं पेड़े समझते हैं, परन्तु सच कहूँ तो वे लोग चूना ही खाते हैं। चूना खाने से क्या दशा होती है यह तो सभी को पता ही होगा। मनुष्य बेचारा मर जाता है। जिस प्रकार साँप को हाथ लगाने से साँप काट लेता है और उसका जहर चढ़ जाता है इसी प्रकार विषय-भोग जहर के समान हैं। उन्हें थोड़ा भी भोगोगे तो पीछे से बहुत दुःख सहन करना पड़ेगा।

कोई मनुष्य जुआ नहीं खेलता, परन्तु रोज-रोज जुआरियों का संग करके उन लोगों को जुआ खेलते देखकर खुद भी जुआ खेलना सीख जाता है। फिर उसे जुआ का ऐसा चस्का लग जाता है कि वह उसके बिना नहीं रह सकता। यही स्थिति विषय-विकारों के साथ भी है इसलिए विषय-विकारों से दूर भागो।

इसके सिवाय, साधकों को निन्दा-स्तुति, राग-द्वेष आदि के भँवर में भी नहीं जाना चाहिए। उसमें गिरकर पुनः चेत जाओ तो ठीक है, परंतु कई बार तो ऐसे भँवर में फँसकर ही जीवन पूरा हो जाता है।

लोग साधना भी करते हैं, भक्ति भी करते हैं, पूजा-पाठ भी करते हैं, ध्यान-भजन भी करते हैं, सेवा भी करते हैं, गुरु के शिष्य भी कहलाते हैं, परन्तु राग-द्वेष के भँवर में जाने की आदत नहीं जाती तो सब साधन-भजन और सेवा के ऊपर पानी फिर जाता है।

साधकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि जिन्हें खराब समझते हैं उनके साथ उदारता से व्यवहार करें, उनके गुण देखें, दोषों को भूल जायें। ऐसा करने से चित्त में शान्ति आने लगेगी। राग-द्वेष को पुष्ट करेंगे तो सभी साधन-भजन चौपट हो जायेंगे। ईर्ष्या और जलन से अन्तःकरण अशुद्ध बनेगा तो साधना का पथ लम्बा हो जायेगा।

आये थे हरिभजन कोओटन लागे कपास।

जो संसार मिथ्या है, हर क्षण बदल रहा है, स्वप्न की तरह गुजरता जा रहा है उसकी सत्यता को दिमाग में भरने से परेशानी के सिवाय कुछ भी हाथ में नहीं आता। तुलसीदासजी ने श्रीरामचरितमानस में शिवजी के मुख से कहलवाया हैः

उमां कहहूँ मैं अनुभव अपना।

सत्य हरि भजन जगत सब सपना।।

सर्वत्र केवल परमात्मा ही व्याप रहे हैं यह जानना ही सत्य हरिभजन‘ का अर्थ है। यदि इसे पूर्ण रूप से जान लिया तो राग-द्वेष, आकर्षण-विकर्षण, इच्छा-वासना सब दूर हो जायेंगे और अपना सहज स्वभाव प्रकट हो जायेगा।

साधना में विघ्न डालें ऐसी बेवकूफियों को हटाओ। दुःख देने वाले अज्ञान को मिटाओ। जगत की सत्यता को चित्त में से हटाओ और अपनी महिमा को जानो। उसके लिए जप करो, सेवा करो और अन्तःकरण को शुद्ध करो। साक्षीभाव एवं समता में रहने का अभ्यास करने से अन्तःकरण शुद्ध होगा जिससे शुद्ध आत्मरस और शुद्ध सुख प्रकट होगा। सत्पुरुषों का संग एवं सत्शास्त्रों का पठन-मनन करने से साधनाकाल की विघ्न-बाधाएँ कम होने लगेंगी।”

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अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती?

15 जनवरी 1958कानपुर।

सत्संग-प्रसंग पर एक जिज्ञासु ने पूज्य बापू से प्रश्न कियाः

“स्वामीजी ! कृपा करके बताएँ कि हमें अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती?”

पूज्य स्वामीजीः “बाबा ! अभ्यास में तब मजा आयेगा जब उसकी जरूरत का अनुभव करोगे।

एक बार एक सियार को खूब प्यास लगी। प्यास से परेशान होता दौड़ता-दौड़ता वह एक नदी के किनारे पर गया और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा। सियार की पानी पीने की इतनी तड़प देखकर नदी में रहने वाली एक मछली ने उससे पूछाः

‘सियार मामा ! तुम्हें पानी से इतना सारा मजा क्यों आता है? मुझे तो पानी में इतना मजा नहीं आता।’

सियार ने जवाब दियाः ‘मुझे पानी से इतना मजा क्यों आता है यह तुझे जानना है?’

मछली ने कहाः ”हाँ मामा!”

सियार ने तुरन्त ही मछली को गले से पकड़कर तपी हुई बालू पर फेंक दिया। मछली बेचारी पानी के बिना बहुत छटपटाने लगी, खूब परेशान हो गई और मृत्यु के एकदम निकट आ गयी। तब सियार ने उसे पुनः पानी में डाल दिया। फिर मछली से पूछाः

‘क्यों? अब तुझे पानी में मजा आने का कारण समझ में आया?’

मछलीः ‘हाँ, अब मुझे पता चला कि पानी ही मेरा जीवन है। उसके सिवाय मेरा जीना असम्भव है।’

इस प्रकार मछली की तरह जब तुम भी अभ्यास की जरूरत का अनुभव करोगे तब तुम अभ्यास के बिना रह नहीं सकोगे। रात दिन उसी में लगे रहोगे।

एक बार गुरु नानकदेव से उनकी माता ने पूछाः

‘बेटा ! रात-दिन क्या बोलता रहता है?’

नानकजी ने कहाः ‘माता जी ! आखां जीवां विसरे मर जाय। रात-दिन मैं अकाल पुरुष के नाम का स्मरण करता हूँ तभी तो जीवित रह सकता हूँ। यदि नहीं जपूँ तो जीना मुश्किल है। यह सब प्रभुनाम-स्मरण की कृपा है।’

इस प्रकार सत्पुरुष अपने साधना-काल में प्रभुनाम-स्मरण के अभ्यास की आवश्यकता का अनुभव करके उसके रंग में रंगे रहते हैं।”

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जीव और शिव का भेद कैसे मिटे?

15 जून 1958कानपुर।

कानपुर के सत्संग में एक साधक ने प्रश्न पूछाः “स्वामी जी ! जीवात्मा और परमात्मा में भेद क्यों दिखता है?”

पूज्य बापू ने एक छोटा-सा किन्तु सचोट उदाहरण देकर सरलता से जवाब देते हुए कहाः

“सच्चे अर्थों में जीवात्मा और परमात्मा दोनों अलग नहीं हैं। जब जीवभाव की अज्ञानता निकल जायेगी और माया की तरफ दृष्टि नहीं डालोगे तब ये दोनों एक ही दिखेंगे। जिस प्रकार थोड़े से गेहूँ एक डिब्बे में हैं और थोड़े से गेहूँ एक टोकरी में हैं और तुम बाद में ‘डिब्बे के गेहूँ और टोकरी के गेहूँ’ इस प्रकार अलग-अलग नाम देते हो परन्तु यदि तुम ‘डिब्बा’ और ‘टोकरी’ ये नाम निकाल दो तो बाकी जो रहेगा वह गेहूँ ही रहेगा।”

दूसरा एक सरल दृष्टांत देते हुए पूज्यश्री ने कहाः

“एक गुरु के शिष्य ने कहाः ‘बेटा !गंगाजल ले आ।’ शिष्य तुरन्त ही गंगा नदी में से एक लोटा पानी भरकर ले आया और गुरुजी को दिया। गुरुजी ने शिष्य से कहाः

‘बेटा ! यह गंगाजल कहाँ है? गंगा के पानी में तो नावें चलती हैं। इसमें नाव कहाँ है? गंगा में तो लोग स्नान करते हैं। इस पानी में लोग स्नान करते हुए क्यों नहीं दिखते?’

शिष्य घबरा गया और बोलाः

‘गुरुजी ! मैं तो गंगा नदी में से ही यह जल लेकर आया हूँ।’

शिष्य को घबराया हुआ देखकर गुरुजी ने धीरे से कहाः

‘बेटा ! घबरा मत। इस पानी और गंगा के पानी में जरा भी भेद नहीं है। केवल मन की कल्पना के कारण ही भिन्नता भासती है। वास्तव में दोनों पानी एक ही हैं और इस पानी को फिर से गंगा में डालेगा तो यह गंगा का पानी हो जायेगा और रत्ती भर भी भेद नहीं लगेगा।

इसी प्रकार आत्मा और परमात्मा भ्रान्ति के कारण अलग-अलग दिखते हैं, परन्तु दोनों एक ही हैं।’

जिस प्रकार एक कमरे के बाहर की और अन्दर की जमीन अलग-अलग दिखती है लेकिन जो दीवार उस जमीन को अलग करती है वह दीवार पाताल तक तो नहीं गयी है। वास्तव में जमीन में कोई भेद नहीं है। दोनों जमीन तो एक ही हैं परन्तु दीवार की भ्रान्ति के कारण अलग-अलग नाम से जानी जाती हैं। ऐसी ही बात जीव और ब्रह्म के साथ है।

घट में स्थित आकाश को घटाकाश कहा जाता है और मठ में स्थित आकाश को मठाकाश कहा जाता है। इन दोनों से बाहर जो व्यापक आकाश है वह महाकाश कहलाता है। घट और मठ की उपाधि से घटाकाश और मठाकाश कहलाता है। वास्तव में घटाकाश और मठाकाश महाकाश से भिन्न नहीं है। घट टूट जाने के बाद घटाकाश महाकाश में मिल जाता है। घट की उपस्थिति में भी घटाकाश महाकाश से मिला हुआ ही है लेकिन घट की उपाधि के कारण घटाकाश महाकाश से अलग होने की भ्रांति होती है।

महामूर्ख कौन ?

26 जून 1958नैनिताल।

आश्रम में पूज्य स्वामी जी थोड़े से भक्तों के सामने सत्संग कर रहे थे, तब एक गृहस्थी साधक ने प्रश्न पूछाः

“गृहस्थाश्रम में रहकर प्रभुभक्ति कैसे की जा सकती है?”

पूज्य स्वामी जी ने प्रश्न का जवाब देते हुए एक सार गर्भित वार्ता कहीः

“ज्ञानचंद नामक एक जिज्ञासु भक्त था। वह सदैव प्रभुभक्ति में लीन रहता था। रोज सुबह उठकर पूजा-पाठ, ध्यान-भजन करने का उसका नियम था। उसके बाद वह दुकान में काम करने जाता। दोपहर के भोजन के समय वह दुकान बंद कर देता और फिर दुकान नहीं खोलता था। बाकी के समय में वह साधु-संतों को भोजन करवाता, गरीबों की सेवा करता, साधु-संग एवं दान-पुण्य करता। व्यापार में जो भी मिलता उसी में संतोष रखकर प्रभुप्रीति के लिए जीवन बिताता था। उसके ऐसे व्यवहार से लोगों को आश्चर्य होता और लोग उसे पागल समझते। लोग कहतेः

‘यह तो महामूर्ख है। कमाये हुए सभी पैसों को दान में लुटा देता है। फिर दुकान भी थोड़ी देर के लिए ही खोलता है। सुबह का कमाई करने का समय भी पूजा-पाठ में गँवा देता है। यह तो पागल ही है।’

एक बार गाँव के नगरसेठ ने उसे अपने पास बुलाया। उसने एक लाल टोपी बनायी थी। नगरसेठ ने वह टोपी ज्ञानचंद को देते हुए कहाः

‘यह टोपी मूर्खों के लिए है। तेरे जैसा महान् मूर्ख मैंने अभी तक नहीं देखा, इसलिए यह टोपी तुझे पहनने के लिए देता हूँ। इसके बाद यदि कोई तेरे से भी ज्यादा बड़ा मूर्ख दिखे तो तू उसे पहनने के लिए दे देना।’

ज्ञानचंद शांति से वह टोपी लेकर घर वापस आ गया। एक दिन वह नगर सेठ खूब बीमार पड़ा। ज्ञानचंद उससे मिलने गया और उसकी तबीयत के हालचाल पूछे। नगरसेठ ने कहाः

‘भाई ! अब तो जाने की तैयारी कर रहा हूँ।’

ज्ञानचंद ने पूछाः ‘कहाँ जाने की तैयारी कर रहे हो? वहाँ आपसे पहले किसी व्यक्ति को सब तैयारी करने के लिए भेजा कि नहीं? आपके साथ आपकी स्त्री, पुत्र, धन, गाड़ी, बंगला वगैरह आयेगा कि नहीं?’

‘भाई ! वहाँ कौन साथ आयेगा? कोई भी साथ नहीं आने वाला है। अकेले ही जाना है। कुटुंब-परिवार, धन-दौलत, महल-गाड़ियाँ सब छोड़कर यहाँ से जाना है। आत्मा-परमात्मा के सिवाय किसी का साथ नहीं रहने वाला है।’

सेठ के इन शब्दों को सुनकर ज्ञानचंद ने खुद को दी गयी वह लाल टोपी नगरसेठ को वापस देते हुए कहाः

‘आप ही इसे पहनो।’

नगरसेठः ‘क्यों?’

ज्ञानचंदः ‘मुझसे ज्यादा मूर्ख तो आप हैं। जब आपको पता था कि पूरी संपत्ति, मकान, परिवार वगैरह सब यहीं रह जायेगा, आपका कोई भी साथी आपके साथ नहीं आयेगा, भगवान के सिवाय कोई भी सच्चा सहारा नहीं है, फिर भी आपने पूरी जिंदगी इन्हीं सबके पीछे क्यों बरबाद कर दी?

सुख में आन बहुत मिल बैठत रहत चौदिस घेरे।

विपत पड़े सभी संग छोड़त कोउ न आवे नेरे।।

जब कोई धनवान एवं शक्तिवान होता है तब सभी ‘सेठ… सेठ…. साहब… साहब…’ करते रहते हैं और अपने स्वार्थ के लिए आपके आसपास घूमते रहते हैं। परंतु जब कोई मुसीबत आती है तब कोई भी मदद के लिए पास नहीं आता। ऐसा जानने के बाद भी आपने क्षणभंगुर वस्तुओं एवं संबंधों के साथ प्रीति की, भगवान से दूर रहे एवं अपने भविष्य का सामान इकट्ठा न किया तो ऐसी अवस्था में आपसे महान् मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है? गुरु तेगबहादुर जी ने कहा हैः

करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ के फंध।

नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध।।

सेठ जी ! अब तो आप कुछ भी नहीं कर सकते। आप भी देख रहे हो कि कोई भी आपकी सहायता करने वाला नहीं है।’

क्या वे लोग महामूर्ख नहीं हैं जो जानते हुए भी मोह-माया में फँसकर ईश्वर से विमुख रहते हैं? संसार की चीजों में, संबंधों का संग एवं दान-पुण्य करते हुए जिंदगी व्यतीत करते तो इस प्रकार दुःखी होने एवं पछताने का समय न आता।”

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भगवान किस पर ज्यादा प्रसन्न रहते हैं ?

25 अप्रैल 1961श्रीकृष्ण गौशालाआगरा।

पूज्य स्वामी जी से किसी ने पूछाः “स्वामी जी ! भगवान किस व्यक्ति पर ज्यादा प्रसन्न होते हैं?”

पूज्य स्वामीजीः “भगवान भक्त, दाता, नम्र एवं शूरवीर-इन चार प्रकार के व्यक्तियों पर ज्यादा प्रसन्न होते हैं।

भक्तः भक्त ऐसा हो जो बालक अवस्था से लेकर जवानी एवं बुढ़ापे तक का अपना पूरा जीवन परमेश्वर की भक्ति में बिताये।

दाताः दाता ऐसा होना चाहिए जो निर्धन होने के बावजूद भी धर्म के दान में प्रीति रखता हो।

नम्रः नम्र माने ऐसा व्यक्ति जो धनवान एवं कुलीन होते हुए भी नम्र हो।

शूरवीरः शूरवीर ऐसा होना चाहिए जो धर्म एवं संस्कृति के लिए अपने सिर का भी बलिदान कर दे एवं इन्द्रियजीत हो।”

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आनन्द का उदगम स्थान क्या है ?

6 जून 1962नैनिताल आश्रम।

संतोषसुमतिसादगी बक्ष करो भगवान।

सबका बेड़ा पार हो दीजिए भक्ति ज्ञान।।

समझदार लोग समझते हैं कि दुनिया के विषयों में, पदार्थों में, वास्तविक सुख नहीं है। तो वास्तविक सुख कहाँ है? हम जब प्रगाढ़ निद्रा में से जागते हैं तब आनन्द भासता है। इससे सिद्ध होता है कि सुख अथवा आनन्द के विषयों के, पदार्थों के बिना भी विद्यमान है। प्रगाढ़ निद्रा में कोई भी पदार्थ उपस्थित नहीं है फिर भी सुखानुभूति है। नींद में से उठने के बाद जब आप कहते हो कि ‘खूब शांति से सोया’ तब आपका कथन यह बताता है कि गहरी नींद अथवा सुषुप्ति अवस्था में आनन्द है। उस अवस्था में आनन्द क्यों लगता है? क्योंकि उस अवस्था में मन एकाग्र हो जाता है और अन्तःकरण की उस अवस्था में आत्मा की छाया पड़ती है तब सुख मिलता है अथवा आनन्द की अनुभूति होती है।

जब हमें कोई इच्छित वस्तु मिलती है अथवा कोई सगे-सम्बन्धी मिलते हैं तब हमें आनन्द होता है। उस समय हम समझते हैं कि वह आनन्द या प्रसन्नता वस्तु अथवा सगे-सम्बन्धियों के मिलने से प्राप्त हुई, परन्तु वास्तव में वह आनन्द उनमें से नहीं मिलता। कई बार हम महसूस करते हैं कि जब हम स्वस्थ नहीं होते तब उस वस्तु अथवा सगे-सम्बन्धी मिलने पर आनन्द नहीं मिलता। स्वस्थ व्यक्ति को इच्छित वस्तु अथवा सगे-सम्बन्धी मिलने पर खुशी इसलिए होती है कि उस समय उसका मन बीमार अवस्था की अपेक्षा ज्यादा स्थिर और एकाग्र होता है। बीमार अवस्था में मन ठीक से स्थिर और एकाग्र नहीं होता, चंचल होता है इसलिए वे चीजें मिलने के बावजूद भी आनन्द नहीं मिलता।

इससे हम समझ सकते हैं कि रमणीय वस्तु अथवा सगे-सम्बन्धियों में आनन्द नहीं है। यदि उनमें आनन्द होता तो अस्वस्थता एवं नीरोगता दोनों अवस्थाओं में वह आनन्द समानरूप से मिलना चाहिए था। याद रखो कि आनन्द तो भगवदस्वरूप आत्मा में है। मन एकाग्र बनता है तब उसमें आत्मा की छाया पड़ती है इसलिए आनन्द मिलता है। चंचल मन में आत्मा की छाया ठीक से नहीं पड़ती इसलिए आनन्द नहीं मिलता।

आत्मा के संयोग से आनन्द मिलता है। आनन्द मन में अथवा वस्तु में नहीं है, परन्तु आत्मा में है और जो आनन्द होता है वह आत्मा का स्पन्दन मात्र है। आनन्द बाहर नहीं है।

जिन विषयों में आनन्द भासित होता है वह आनन्द तो कृत्रिम है। उदाहरणार्थः फोड़ा हुआ और उस पर पट्टी बाँधी तो मलहम अथवा पट्टी अथवा फोड़े में से नहीं निकला। फोड़ा होने के पहले जो सुख था वह सुख ओझल हो गया था  जो अब पुनः प्रगट हुआ। कोई नया सुख नहीं मिला। किन्तु दुःख देखे बिना सुख समझ में नहीं आता, सुख की कद्र नहीं होती, अन्यथा आत्मा का सुख तो निरन्तर बना हुआ है।

दूसरा उदाहरण देखें- जब तालाब का जल स्थिर और तुच्छ होता है उसके तले की रेती दिखती है किन्तु पानी अगर चंचल और मैला होता है तो तालाब का तल नहीं दिखाई देता।

मनरूपी जल स्थिर और स्वच्छ होता है तो तलरूपी आनन्द तो विद्यमान है ही। इच्छाओं के कारण मटमैला हुआ मनरूपी पानी तलरूपी आनन्द को नहीं दिखाता इसीलिए सुखानुभूति के लिए मन स्थिर होना चाहिए।

पदार्थों में सुखानुभूति करते समय मनुष्य वास्तव में अपनी आत्मा का ही आनन्द लेते हैं और उस आनन्द को पदार्थों में आरोपित कर देते हैं। प्रत्येक सुख शुद्ध आनन्द के भण्डार में से ही आता है किन्तु भूला हुआ जीव आनन्द के मूल उदगम-स्थान पर मूल पद पर नहीं आता।

यदि मनुष्य की दृष्टि बदल जाये तो यह सत्य समझा जा सकता है। वस्तु में आनन्द मानने की आदत पड़ गई है उससे आनन्द प्रगटता नहीं। सूखी हड्डी चबाते हुए कुत्ते के जबड़े में उस हडड़ी के कारण जख्म हो जाता है और उससे खून निकलता है। कुत्ते को उस खून का स्वाद आता है। वह समझता है कि खून हड्डी में से निकल रहा है। वह ऐसा नहीं जानता कि यह तो उसका खुद का खून है। हड्डी में खून कहाँ से आयेगा?

लाखों में से किसी एक विरले को ही सच्चे सुख अथवा आनन्द का ज्ञान होता है। हम सब सुख तो चाहते हैं परन्तु समझते हैं कि सुख इन्द्रियों अथवा विषयों में यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध में है, परन्तु वह सच्चा सुख नहीं है। सच्चा सुख तो आत्मा में है। उस सुख की झलक यदि एक बार भी मिल जाये तो फिर संसार के भोग और संसार के पदार्थ फीके लगेंगे और मन बार-बार उस आत्मसुख की ओर दौड़ेगा।

अतः संसार में होते हुए भी हृदय में निरन्तर भगवान का, स्मरण करते रहो। कर्म करते हुए भी अकर्त्ता-अभोक्ता होकर रहो। खराब संग, खराब विचार, खराब कर्म से हमेशा दूर रहो। सदैव भलाई के और पुण्य के कार्य करते रहो। सच्चे संकल्प एवं शुभ विचारों से, भलाई के कर्म करने से अन्तःकरण निर्मल होगा। ऐसा करने से अन्तःकरण में संसार की जगह परमात्मा का स्मरण बढ़ जायेगा और सच्चा सुख एवं शान्ति मिलेगी।

अनुक्रम

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विजय किसकी होगी ?

14 अप्रैल 1965आगरा।

स्वामी जी सत्संग-मंडप में व्यासपीठ पर विराजमान थे। उस समय किसी भक्त ने धर्म की विजय के बारे में स्वामी जी से पूछाः

“स्वामीजी ! चारों ओर युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं, जिन्हें देखकर दिल काँप उठता है। अन्त में विजय किसकी होगी?”

पूज्य स्वामी जी ने मंद-मंद मुस्कराते हुए जवाब दियाः

“बाबा ! यह कोई नई बात नहीं है। युगों से यह रीति चली आ रही है। प्रकृति के नियम के अनुसार हमेशा धर्म की विजय और अधर्म का नाश होता है। कौरव एवं पाण्डव के युद्ध को हजारों वर्ष हो गये, फिर भी आज पाण्डवों का यश चमक रहा है। श्रीरामचन्द्रजी के साथ रावण का घोर युद्ध हुआ जिसमें कई राक्षस मारे गये। अन्त में भगवान राम की विजय हुई। अत्याचार, अधर्म, अनीति और अन्याय के कारण कौरव एवं रावण की आखिर में पराजय हुई।”

पाप का घड़ा भरकर अन्त में फूट जाता है, परन्तु जो धर्म के, सत्य के, कल्याण के मार्ग पर चलता है उसे भला भय कैसा ? उन लोगों को शुरुआत में दुःख अवश्य देखना पड़ता है, परन्तु अन्त में विजय तो सत्य की ही होती है।

अनुक्रम

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अपना आत्म-साम्राज्य पा लो

16 दिसम्बर 1965श्रीकृष्ण गौशालाआगरा।

भ्रान्ति अर्थात् सत्य वस्तु को यथावत् न जानकर उसे गलत रूप से मानना या जानना। जैसे, हो तो रस्सी और दिखे सर्प। वास्तविक रूप से देखें तो वह सर्प होता नहीं है और काटता भी नहीं है। उसी प्रकार सत्यस्वरूप परमात्मा को न जानकर नाम रूपवाले जगत को सत्य मानना यह भ्रान्ति है। जगत में जो मोह अथवा भ्रान्ति भास रही है वह नाम-रूप की है। हम जो भी वस्तु देखते हैं वे सब मिट्टी के सिवाय दूसरा कुछ नहीं है। फिर भी घड़ा, पुस्तक, मनुष्य, पशु, मकान वगैरह नाम व्यवहार को चलाने के लिए देने पड़ते हैं। स्वरूप के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है फिर भी भासित होने वाले जीवरूप हम, भासनेवाली वस्तुओं में व्यवहार के लिए अलग-अलग नाम-रूप देते हैं और उन्हें ही सत्य मान लेते हैं। उदाहरणार्थः एक कागज पर हम छलनी ढाँक दें तो प्रत्येक छिद्र में से कागज दिखता है फिर भी प्रत्येक छिद्रवाला भाग अपने को दूसरे छिद्रवाले भाग से अलग माने तो यह भ्रान्ति है। इसी प्रकार माया के आवरण से ढका हुआ जीव जब जन्मता है तब उसमें देह, कुटुम्ब एवं जगत के जैसे संस्कार पड़ते हैं वैसा वह अपने को मान लेता है। यह माया का आवरण हट जाये या अविद्या निकल जाये तो सच्चा आनन्द प्रकट होगा। सिंधी के प्रसिद्ध कवि सामी साहब कहते हैं-

अविद्या भुलाऐविधो जीउ भरम में।

नांगु डिसी नोढ़ीअ मेंडंगु रे डहकाए।।

अण हुन्दे दरियाह मेंगोता नितु खाए।

मुंह मढ़ीअ पाय सामी डिसे कीनकी।।

अविद्या ने भूल-भुलैया करके जीव को भ्रम में डाल दिया है अतः यह जीव स्वयं को दुःखी बना रहा है। जहाँ सागर ही नहीं है वहाँ सागर में ही गोता खा रहा है। ‘सामी’ कहते हैं कि ‘ हे जीव ! तू अन्तर में झाँककर तो देख।’

एक बार एक राजमहल में पाँच वर्ष का राजकुमार सोया हुआ था। एक भील ने अवसर देखकर धन के लोभ में उस राजकुमार को उठा लिया। जंगल में जाकर उसके सब आभूषण ले लिए और उस राजकुमार को अपने बेटों के साथ पालने लगा। राजकुमार भील के बच्चों के साथ खाते-पीते और खेलते-खेलते उन जैसा ही हो गया।

जब राजकुमार युवावस्था में आया तो वह भी भील लोगों जैसा व्यवहार और काम करने लगा अर्थात् हिंसा, चोरी, पाप, जीवों की हत्या करने लगा और अपने को भील ही समझने लगा। एक दिन वह घूमते-घामते, शिकार करते-करते घोर जंगल में पहुँच गया। रास्ते में उसे पानी की बहुत प्यास लगी। पानी की खोज में इधर-उधर जाँच की तो उसे एक महात्मा की कुटिया नजर आयी। तुरन्त ही कुटिया में जाकर उसने उन महात्मा को प्रणाम किया एवं प्रार्थना कीः

“महाराज ! मुझे बहुत प्यास लगी है। मेहरबानी करके मुझे पानी पिलाइए।”

पहले वे महात्मा जब उस राजकुमार के राज्य में जाते थे तब उन्होंने उस राजकुमार को अच्छी तरह देखा था। अतः राजकुमार को देखते ही वे उसे पहचान गये कि यह तो खोया हुआ राजकुमार है। महात्मा ने उसे बैठाया और कहाः

“मैं तुझे पानी तो पिलाऊँगा, परन्तु तू पहले मुझे जवाब दे कि तू कौन है ?”

लड़के ने जवाब दियाः “मैं भील हूँ।”

महात्मा ने कहाः “तू भील नही है परन्तु राजकुमार है। मैं तुझे अच्छी तरह जानता हूँ। तू भील लोगों के साथ बड़ा होकर भील लोगों जैसे काम करके अपने को भील समझने लगा है।

तू अपने आपको पहचान कि तू कौन है? अपने वास्तविक स्वरूप को याद कर। जब तुझे तेरी सच्ची पहचान होगी तब तू भील के जीवन को छोड़कर राजमहल में जाकर राज्य-सुख भोगेगा।”

राजकुमार ने महात्मा के वचन सुनकर अपना बचपन याद किया तो उसे अपने माँ-बाप, राज्य, राजदरबार, सेवक, वगैरह याद आ गये और तुरन्त ही स्मरण हुआ कि “मैं भील नहीं, मैं निःसंदेह राजकुमार हूँ। अब तक अज्ञानता में व्यर्थ ही अपने को भील समझकर दीन-हीन होकर भील का तुच्छ जीवन जीता था।”

महात्मा ने तुरन्त राजा को सन्देश भेजा कि आपका खोया हुआ राजकुमार मिल गया है। राजा ने तुरन्त ही राजकुमार के वस्त्र, आभूषण, घोड़े, रथ वगैरह भेजे। फिर राजा के आदमियों के साथ राजकुमार राजमहल में गया। वहाँ राजपद पाकर आनन्द से रहने लगा।

इस दृष्टांत का तात्पर्य यह है कि इस जीवरूप राजकुमार को देहाध्यास अर्थात् भ्रान्ति के कारण काम, क्रोध, लोभ वगैरह भीलों ने अपने वश में करके संसाररूपी घोर वन में ले जाकर उसके दैवी सम्पदा के सदगुणरूपी आभूषणों को उतारकर काम, क्रोध आदि भील विकारों ने अपने जैसा ही बना दिया है। यह जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर भ्रान्ति से अपने को भील मानकर अनेक प्रकार के कुकर्म कर रहा है। अज्ञानता के कारण यह समझ रहा है कि ‘मैं कर्त्ता हूँ…. मैं भोक्ता हूँ…. मैं पुण्यात्मा हूँ…. मैं पापी हूँ….. मैं दुःखी हूँ….’

इस प्रकार अज्ञानी जीव अपने को कर्त्ता-भोक्ता, सुखी-दुःखी मानकर संसाररूपी जंगल में भटक रहा है। जब वह किसी पुण्यों के प्रताप से किन्ही आत्मवेत्ता सदगुरु की शरण में जाता है तब सदगुरु उसे ज्ञान का उपदेश देते हैं कि ‘तू देह नहीं है… तू अज्ञानी नहीं है…. तू जाति-वर्णवाला नहीं है…. तू कर्त्ता-भोक्ता नहीं है…. तू पाप-पुण्य के संबंधवाला नहीं है। तू शुद्ध, बुद्ध, सच्चिदानंदस्वरूप, चिदघनस्वरूप को भूलकर इस अवस्था में आया है। जब तू अपने वास्तविक स्वरूप को जानेगा तभी सुखी होगा और सच्ची शान्ति पायेगा।’

सदगुरु के ऐसे उपदेश से वह जीव देहाध्यास की भ्रान्ति को हटाकर अपने साक्षीस्वरूप को, अभिन्न एकरूप ब्रह्म की अद्वैत निष्ठा को प्राप्त करके सुखसागर में, ब्रह्म में निमग्न हो जाता है।

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नानक ! दुखिया सब संसार……

4 मार्च 1966अजमेर।

दो मित्र चार-पाँच वर्ष के बाद एक-दूसरे से मिले और परस्पर खबर पूछने लगे। एक मित्र ने दुःखी आवाज में कहाः

“मेरे पास एक सुन्दर बड़ा घर था। दस बीघा जमीन थी। दस-बारह बैल थे। गायें थीं, पाँच बछड़े भी थे परन्तु मैंने वह सब खो दिया। मेरी पत्नी और मेरे बालक भी मर गये। मेरे पास केवल ये पहने हुए कपड़े ही रह गये हैं।”

यह सुनकर उसका मित्र हँसने लगा। उसको हँसता हुआ देखकर इसको गुस्सा आया। वह बोलाः

“त मेरा जिगरी दोस्त है। मेरी इस दशा पर तुझे दुःख नहीं होता और ऊपर से मजाक करता है? तुझे तो मेरी हालत देखकर दुःखी होना चाहिए।”

मित्र ने कहाः “हाँ….’तेरी बात सच्ची है। परन्तु अब मेरी बात भी सुनः मेरे पास पैंसठ बीघा जमीन थी। लगभग तीस मकान थे। मैंने शादी की तो 21 बालक हुए। लगभग तीस बैल और गायें थीं। सिंध नेशनल बैंक में पाँच लाख रुपये थे। मैंने वह सब खो दिया। मैंने अपनी परिस्थिति का स्मरण किया तो मेरी तुलना में तेरा दुःख तो कुछ भी नहीं है। इसलिए मुझे हँसी आ गयी।”

विचार करें तो संसार और संसार के नश्वर भोग-पदार्थों में सच्चा सुख नहीं है। यह सब आज है और कल नहीं। सब परिवर्तनशील है, नाशवान है।

एक सेठ प्रतिदिन साधु संतों को भोजन कराता था। एक बार एक नवयुवक संन्यासी उसके यहाँ भिक्षा के लिए आया। सेठ का वैभव-विलास देखकर वह खूब प्रभावित हुआ और विचारने लगाः

‘संत तो कहते हैं कि संसार दुःखालय है, परन्तु यहाँ इस सेठ के पास कितने सारे सोने-चाँदी के बर्तन हैं ! सुख के सभी साधन हैं ! यह बहुत सुखी लगता है।’ ऐसा मानकर उसने सेठ से पूछाः

“सेठजी ! आप तो बहुत सुखी लगते हैं। मैं मानता हूँ कि आपको कोई दुःख नहीं होगा।”

सेठजी की आँखों में से टप-टप आँसू टपकने लगे। सेठ ने जवाब दियाः “मेरे पास धन-दौलत तो बहुत है परन्तु मुझे एक भी सन्तान नहीं है। इस बात का दुःख है।”

संसार में गरीब हो या अमीर, प्रत्येक को कुछ न कुछ दुःख अथवा मुसीबत होती है। किसी को पत्नी से दुःख होता है तो किसी की पत्नी नहीं है इसलिए दुःख होता है। किसी को सन्तान से दुःख होता है तो किसी की सन्तान नहीं होती है इस बात का दुःख होता है। किसी को नौकरी से दुःख होता है तो किसी को नौकरी नहीं है इस बात का दुःख होता है।

कोई कुटुम्ब से दुःखी होता है तो किसी का कुटुम्ब नहीं है इस बात का दुःख होता है। किसी को धन से दुःख होता है तो किसी को धन नहीं है इस बात का दुःख होता है। इस प्रकार किसी-न-किसी कारण से सभी दुःखी होते हैं।

नानक ! दुखिया सब संसार….

तुम्हें यदि सदा के लिए परम सुखी होना है तो तमाम सुख-दुःख के साक्षी बनो। तुम अमर आत्मा हो, आनन्दस्वरूप हो…. ऐसा चिन्तन करो। तुम शरीर नहीं हो। सुख-दुःख मन को होता है। राग-द्वेष बुद्धि को होता है। भूख-प्यास प्राणों को लगती है। प्रारब्धवश जिन्दगी में कोई दुःख आये तो ऐसा समझो कि मेरे कर्म कट रहे हैं…. मैं शुद्ध हो रहा हूँ।

एक बार लक्ष्मण ने भगवान श्री राम से कहाः “कैकेयी को मजा चखाना चाहिए।”

भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को रोका और कहाः

“कैकेयी तो मुझे मेरी माता कौशल्या से भी ज्यादा प्रेम करती है। उस बेचारी का क्या दोष? सभी कुछ प्रारब्ध के वश में है। केकेयी माता यदि ऐसा न करती तो बनवास कौन जाता और राक्षसों को कौन मारता? याद रखो कि कोई किसी का कुछ नहीं करता।

नाच नचे संसार मतिमन के भाई सुभाई।

होवनहार न मिटे कसतोड़े यत्न कोढ़ कमाई।।

जो समय बीत गया वह बीत गया। जो समय बाकी रहा है उसका सदुपयोग करो। दुर्लभ योनि बार-बार नहीं मिलती इसलिए आज से ही मन में दृढ़ निश्चय करो कि ‘मैं सत्पुरुषों का संग करके, सत्शास्त्रों का अध्ययन करके, विवेक और वैराग्य का आश्रय लेकर, अपने कर्त्तव्यों का पालन करके इस मनुष्य जन्म में ही मोक्ष पद की प्राप्ति करूँगा…. सच्चे सुख का अनुभव करुँगा।’ इस संकल्प को कभी-कभार दोहराते रहने से दृढ़ता बढ़ेगी।

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आध्यात्मिक मार्ग पर कैसे चलूँ ?

आगरा।

एक जिज्ञासु ने पूछाः “महाराज ! ईश्वर की तरफ जाने की इच्छा तो बहुत होती है परन्तु मन साथ नहीं देता। क्या करूँ?”

पूज्य बापू ने कहाः “मुक्ति की इच्छा कर लो।”

जिज्ञासुः “परन्तु इच्छा-वासनाएँ मिटती नहीं हैं।”

तब पूज्य बापू ने जवाब दियाः

“इच्छा-वासनाएँ नहीं मिटती हैं तो उसकी चिन्ता मत करो। उसके बदले ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा करो। रोज जोर-जोर से बोलकर दृढ़ संकल्प करो कि “मुझे इसी जन्म में राजा जनक की तरह आत्मा का अनुभव करना है।”जिस प्रकार देवव्रत (भीष्म पितामह) ने जोर से बोलकर संकल्प किया था किः

‘हे गन्धर्व ! सुन लें। हे देवता लोग ! सुन लें। हे यक्ष और किन्नर ! सुन लें। हे राक्षस ! सुन लें। मैं शान्तुनपुत्र देवव्रत प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं अखण्ड ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूँगा…. मैं विवाह नहीं करूँगा….. नहीं करूँगा….. नहीं करूँगा….’

इस प्रकार तुम एकान्त कक्ष में बैठकर अपने शुभ संकल्प को जोर से दोहराओः ‘मैं इसी जन्म में आत्मा में स्थिति प्राप्त करूँगा…. मैं इसी जन्म में राग-द्वेष से मुक्त हो जाऊँगा। मैं अमुक का पुत्र, अमुक गुरु का शिष्य…. जैसा बाप वैसा बेटा….. इसी जन्म में आत्म-साक्षात्कार करूँगा….’ इस प्रकार बारंबार शुभ संकल्पों को दोहराओ।

जिन्दगी में दूसरा कोई आग्रह न रखो। नव ग्रहों से भी आग्रह ज्यादा खतरनाक है। शरीर की तन्दुरुस्ती और मन की पवित्रता का ख्याल रखकर जो भी सादा या स्वादिष्ट मिल जाये उसे खा लिया, पी लिया, ओढ़ लिया…. परन्तु ‘ऐसा ही कहिए…. वैसा हो चाहिए…. ऐसा ही होना चाहिए… वैसा ही होना चाहिए….’ ऐसा आग्रह मत रखो। इच्छा पूरी न होने पर ऐसा आग्रह हृदय में कलह और अशान्ति पैदा करता है। साथ ही साथ मन-बुद्धि में आसक्ति, अहंकार, राग और द्वेष भी भर देता है। यह आग्रह ही तो चौरासी लाख जन्मों में धकेल देता है। अतः कोई भी आग्रह मत रखो। छोटे-बड़े सभी आग्रहों को निकालने के लिए केवल एक ही आग्रह रखो कि ‘कुछ भी हो जाये, इसी जन्म में भगवान के आनन्द को, भगवान के ज्ञान को और भगवद्-शान्ति को प्राप्त करके मुक्त आत्मा होकर रहूँगा।’

इस प्रकार मन को दुराग्रह से छुड़ाकर केवल परमात्म-प्राप्ति का ही आग्रह रखोगे तो मार्ग सरल हो जायेगा।

मैं आत्मा हूँ ऐसी भावना हमेशा करो। जिस प्रकार कोई करोड़पति ‘मैं कंगाल हूँ…’ ऐसी दृढ़ भावना करेगा तो अपने को कंगाल ही मानेगा, परन्तु मैं ‘करोड़पति हूँ’ ऐसा भाव करेगा तो अपने को करोड़पति मानेगा। इसी प्रकार ‘मैं आत्मा हूँ’ ऐसी भावना करो। रोज सुबह एकान्त कक्ष में ‘मैं ब्रह्म हूँ…. अमर हूँ… चैतन्य हूँ… मुक्त हूँ…. सत्यस्वरूप हूँ…..’ ऐसा शुभ संकल्प करो परन्तु ‘मैं मारवाड़ी हूँ… सिन्धी हूँ…. गुजराती हूँ…. पंजाबी हूँ…. सुखी हूँ…. दःखी हूँ…’ ऐसी झूठी भावना मत करना। ऐसी झूठी भावना करने से सुखी होने के बदले दुःखी और अशांत ही होगे। ऐसे मिथ्या संस्कार तुम्हें जन्म-मरण के चक्र में डाल देंगे।

तुम इस जन्म में सुख और शान्ति पाने के उपाय ढूँढो और सोचो कि अब क्या करना चाहिए? ऐसा नहीं कि तुम किसी साधु-संत के पास जाकर कहो किः ‘साँई ! मेरी पत्नी का स्वभाव बदल डालो।’

अरे भाई ! तू अपना ही स्वभाव बदल, अपनी समझ सुधार ले। पत्नी का स्वभाव बदलेगा तो फिर कहोगे कि ‘बेटे का स्वभाव बदलो… विरोधी का स्वभाव बदलो….’ तू अपना ही स्वभाव क्यों नहीं बदलता? उन लोगों में से अपनी आसक्ति क्यों नहीं खींच लेता? उल्टे फँस मरने की माँग करता है?

‘ऐसा हो जाए तो अच्छा…. वैसा मिल जाए तो अच्छा….’ इसकी अपेक्षा तो तू जहाँ है वहीं से मुक्त स्वभाव की ओर चल। अपनी बेवकूफी तो छोड़नी नहीं है और दुःख मिटाना चाहता हो?

अपनी बेवकूफी क्या है? अपनी कल्पना के अनुसार संसार को, पत्नी को, पति को, बेटे को, मित्र को, नौकर को बदलकर सुखी होने की जो माँग है, वही बेवकूफी है। वास्तव में, ऐसा करने से कोई भी सुखी नहीं हुआ है। सुखी तो तभी हुआ जा सकता है जब अपने ब्रह्मत्व की, अपने सत्यस्वरूप की स्मृति दृढ़ कर लो।

इस प्रकार मन में शुभ एवं सत्य संकल्पों को रोज-रोज दोहराने से, तुम्हारी इच्छा-वासनारूपी दुराग्रहों को छोड़ने से और तुम्हारे निज स्वरूप का स्मरण करने से तुम्हारा आध्यात्मिक पथ सरल हो जायेगा।”

आत्मधन है ही ऐसा…..

मुंबई।

पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू किसी भक्त के घर सत्संग कर रहे थे। उस समय पूज्य स्वामी जी ने सत्संगियों से पूछाः

“तुम कौन हो और क्या-क्या करते हो?”

तब सबने अपना-अपना परिचय देते हुए कहाः “मैं वकील हूँ… मैं डॉक्टर हूँ… मैं इंजीनियर हूँ…. मैं व्यापारी हूँ…. मैं उद्योगपति हूँ…. मैं जज हूँ….” आदि आदि। सबको सुन लेने के बाद पूज्य स्वामी जी ने कहाः “भाई ! तुम लोग तो डॉक्टर, वकील, व्यापारी, आफिसर, इंजीनियर, जज आदि पता नहीं कौन-कौन-सी बड़ी-बड़ी पदवीवाले हो। फिर भी तुम सब मेरे आगे घास काटते हो। बोलो, घास काटते हो कि नहीं?”

सबने पूज्य स्वामीजी की बात से सहमत होकर कहाः

“जी साँई।”

“हाँ, तुम सब तो भाँति-भाँति के पद और उपाधियाँ लेकर बैठे हो फिर भी अशान्त और असन्तुष्ट हो, परन्तु विचार करो कि यह सब पाने के बाद भी आखिर क्या है? यह सब शरीर की सुख-सुविधाओं के लिए है किन्तु आज तक किसी का शरीर सदैव नहीं रहा है। ये सब उपाधियाँ और पद, मान और प्रतिष्ठा सब शरीर के साथ छूट जायेंगी। आनेवाले जन्म में इनमें से कुछ भी साथ नहीं आयेगा। ब्रह्मज्ञान के आगे धन, रूप, एवं ऐहिक विद्या की कोई कीमत नहीं है। आत्मतत्त्व की साधना के बिना यह सब व्यर्थ है। मैं तो कुछ भी नहीं पढ़ा हूँ फिर भी बादशाह हूँ। बोलो, हूँ कि नहीं?”

पूज्य स्वामी जी की बात में सच्चाई थी अतः कौन ‘ना’ कह सकता था?

“जी स्वामी जी ! आप तो बादशाह हैं।”

यह सुनकर पूज्य स्वामीजी जोर से हँस पड़े और इसके साथ दूसरे लोग भी हँस पड़े। हँसना बन्द होते ही पूज्य स्वामी जी ने कहाः “क्या करें भाई ! आत्मधन है ही ऐसा। यह जिसे मिल जाता है उसे सब मिल जाता है। उसके आनन्द के आगे इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद भी फीका लगता है। जिसे यह आत्मधन नहीं मिला उसे संसार के अन्य ऐश्वर्य और धन-सम्पत्ति भी मिल जाये तो भी न मिले हुए जैसे ही होते हैं क्योंकि मृत्यु के एक झटके में यह सब छूट जाता है। तुम्हें यदि कुछ पाना ही हो तो इस आत्मपद को पाओ, आत्म-साक्षात्कार करो। अतः ऐसे नश्वर खिलौनों से राजी नहीं होना है। व्यवहार के लिए यह सब ठीक है, परन्तु सच्ची शांति और आनन्द तो अपने स्वरूप को जानने से ही मिलता है। परन्तु… मन बहुत बेईमान है। वह हमें वहाँ तक जाने नहीं देता। अतः खूब सत्संग करो, साधु-संग करो और सत्शास्त्रों का अध्ययन करो।”

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संतों के रहस्यमय आशीर्वाद

गणेषपुरीमुंबई।

एक बार पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू एक भक्त के बंगले में एकान्तवास कर रहे थे। एक दिन एक श्रद्धालु कुटुम्ब एक नवदम्पत्ती को लेकर पूज्यश्री के दर्शन करने एवं आशीर्वाद लेने के लिए आया। दूल्हे के माता-पिता ने पूज्य स्वामी जी से प्रार्थना कीः

“स्वामीजी ! इन लोगों ने नई-नई शादी की है। इन्हें आशीर्वाद दो कि इन लोगों का दाम्पत्य जीवन सुखी हो एवं एक-दूसरे के प्रति दोनों का प्रेम खूब बढ़े।”

पूज्य स्वामीजी ने तुरन्त ही कहाः

“ये आशीर्वाद थोड़े ही हैं। आशीर्वाद तो मैं ऐसा देता हूँ कि पत्नी या झगड़ालू मिले या कुरुप, जिससे एक-दूसरे में मोह न हो। ऐसा होगा तभी दूल्हे का कल्याण होगा। नहीं तो सत्यानाश होगा।’

सुथरा नाम के एक उच्च कोटि के संत हो गए। एक बार वे किसी मंदिर में बैठे थे। उस समय मंदिर के पुजारी के पास वर-कन्या आशीर्वाद लेने के लिए आये। मंदिर के पुजारी ने दक्षिणा ली एवं वर-कन्या को आशीर्वाद दियेः

“जुग जुग जियो… जुग जुग जियो।”

वर-कन्या के साथ आये हुए दूसरे कुटुम्बियों ने भी पुजारी को प्रणाम किया। उन लोगों को भी पुजारी ने ऐसे ही आशीर्वाद दियेः

“जुग जुग जियो… जुग जुग जियो।”

फिर, जहाँ ब्रह्मज्ञानी संत सुथरा बाबा बैठे थे उनके पास जाकर मिठाई की पेटी रखने के लिए पुजारी ने उन लोगों को कहा और उनके आशीर्वाद लेने के लिए प्रेरणा दी। वे लोग सुथरा बाबा के पास गये। पहले दूल्हे ने पैर छूकर आशीर्वाद माँगे तो संत ने कहाः

“तू मर जायेगा।”

फिर कन्या ने प्रणाम किये तो कहाः

“तू भी मर जायेगी।”

उन लोगों के माँ-बाप ने प्रणाम किये तो कहाः

“तुम लोग भी मर जाओगे।”

माँ-बाप तुरन्त ही घबराकर बोलेः “महाराज ! आप यह क्या कहते हैं ! उन पुजारी ने तो जुग-जुग जीने का आशीर्वाद दिया और आपने हमें मर जाने का आशीर्वाद दिया। ऐसा क्यों?”

सुथरा बाबा बोलेः

“झूठ बोलने का काम मुल्ला-मौलवियों एवं पंडित-पुजारियों का है। हम तो सच्ची बात बताते हैं कि सबकी मृत्यु अनिवार्य है। तुम लोग कभी-न-कभी मर जाओगे इसलिए सावधानी से जियो। ‘जुग जुग जियो’ का आशीर्वाद देने वाले खुद ही जुग जुग जीनेवाले नहीं हैं तो तुम क्या जुग जुग जियोगे?”

हमेशा विवेक से जियो। विवेक से विचारो कि कब तक जियेंगे। विवेक होगा तो वैराग्य आयेगा। वैराग्य के कारण मोक्ष पाने की इच्छा होगी। मुफ्त के ‘जुग जुग जियो’ के आशीर्वाद से कुछ नहीं होगा। मनुष्य का जीवन भोग-विलास के लिए नहीं है। प्रत्येक मनुष्य को हमेशा अपनी मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। संसार के बन्धनों एवं विषय-विकारों के बन्धनों से छूटने का यत्न करना चाहिए। जैसी भावना करोगे वैसा यत्न करोगे। जैसा यत्न करोगे वैसा संग मिलेगा। जैसा संग मिलेगा वैसा रंग लगेगा और जैसा रंग लगेगा वैसा भविष्य बनेगा। अतः ईश्वर एवं मृत्यु को कभी भी भूलना नहीं चाहिए वरन् सावधान रहना चाहिए।

हरि सम जग कछु वस्तु नहींमोक्ष पंथ सम पंथ।

सदगुरु सम सज्जन नहींगीता सम नहीं ग्रंथ।।

सच्चे संत-महात्मा ही लोगों को कड़वा सत्य बता सकते हैं और जीवन जीने का सच्चा रास्ता बताते हैं। सच्चे अर्थों में वे महापुरुष ही समाज के सच्चे हितै

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आत्मधन है ही ऐसा…..

मुंबई।

पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू किसी भक्त के घर सत्संग कर रहे थे। उस समय पूज्य स्वामी जी ने सत्संगियों से पूछाः

“तुम कौन हो और क्या-क्या करते हो?”

तब सबने अपना-अपना परिचय देते हुए कहाः “मैं वकील हूँ… मैं डॉक्टर हूँ… मैं इंजीनियर हूँ…. मैं व्यापारी हूँ…. मैं उद्योगपति हूँ…. मैं जज हूँ….” आदि आदि। सबको सुन लेने के बाद पूज्य स्वामी जी ने कहाः “भाई ! तुम लोग तो डॉक्टर, वकील, व्यापारी, आफिसर, इंजीनियर, जज आदि पता नहीं कौन-कौन-सी बड़ी-बड़ी पदवीवाले हो। फिर भी तुम सब मेरे आगे घास काटते हो। बोलो, घास काटते हो कि नहीं?”

सबने पूज्य स्वामीजी की बात से सहमत होकर कहाः

“जी साँई।”

“हाँ, तुम सब तो भाँति-भाँति के पद और उपाधियाँ लेकर बैठे हो फिर भी अशान्त और असन्तुष्ट हो, परन्तु विचार करो कि यह सब पाने के बाद भी आखिर क्या है? यह सब शरीर की सुख-सुविधाओं के लिए है किन्तु आज तक किसी का शरीर सदैव नहीं रहा है। ये सब उपाधियाँ और पद, मान और प्रतिष्ठा सब शरीर के साथ छूट जायेंगी। आनेवाले जन्म में इनमें से कुछ भी साथ नहीं आयेगा। ब्रह्मज्ञान के आगे धन, रूप, एवं ऐहिक विद्या की कोई कीमत नहीं है। आत्मतत्त्व की साधना के बिना यह सब व्यर्थ है। मैं तो कुछ भी नहीं पढ़ा हूँ फिर भी बादशाह हूँ। बोलो, हूँ कि नहीं?”

पूज्य स्वामी जी की बात में सच्चाई थी अतः कौन ‘ना’ कह सकता था?

“जी स्वामी जी ! आप तो बादशाह हैं।”

यह सुनकर पूज्य स्वामीजी जोर से हँस पड़े और इसके साथ दूसरे लोग भी हँस पड़े। हँसना बन्द होते ही पूज्य स्वामी जी ने कहाः “क्या करें भाई ! आत्मधन है ही ऐसा। यह जिसे मिल जाता है उसे सब मिल जाता है। उसके आनन्द के आगे इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पद भी फीका लगता है। जिसे यह आत्मधन नहीं मिला उसे संसार के अन्य ऐश्वर्य और धन-सम्पत्ति भी मिल जाये तो भी न मिले हुए जैसे ही होते हैं क्योंकि मृत्यु के एक झटके में यह सब छूट जाता है। तुम्हें यदि कुछ पाना ही हो तो इस आत्मपद को पाओ, आत्म-साक्षात्कार करो। अतः ऐसे नश्वर खिलौनों से राजी नहीं होना है। व्यवहार के लिए यह सब ठीक है, परन्तु सच्ची शांति और आनन्द तो अपने स्वरूप को जानने से ही मिलता है। परन्तु… मन बहुत बेईमान है। वह हमें वहाँ तक जाने नहीं देता। अतः खूब सत्संग करो, साधु-संग करो और सत्शास्त्रों का अध्ययन करो।”

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संतों के रहस्यमय आशीर्वाद

गणेषपुरीमुंबई।

एक बार पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू एक भक्त के बंगले में एकान्तवास कर रहे थे। एक दिन एक श्रद्धालु कुटुम्ब एक नवदम्पत्ती को लेकर पूज्यश्री के दर्शन करने एवं आशीर्वाद लेने के लिए आया। दूल्हे के माता-पिता ने पूज्य स्वामी जी से प्रार्थना कीः

“स्वामीजी ! इन लोगों ने नई-नई शादी की है। इन्हें आशीर्वाद दो कि इन लोगों का दाम्पत्य जीवन सुखी हो एवं एक-दूसरे के प्रति दोनों का प्रेम खूब बढ़े।”

पूज्य स्वामीजी ने तुरन्त ही कहाः

“ये आशीर्वाद थोड़े ही हैं। आशीर्वाद तो मैं ऐसा देता हूँ कि पत्नी या झगड़ालू मिले या कुरुप, जिससे एक-दूसरे में मोह न हो। ऐसा होगा तभी दूल्हे का कल्याण होगा। नहीं तो सत्यानाश होगा।’

सुथरा नाम के एक उच्च कोटि के संत हो गए। एक बार वे किसी मंदिर में बैठे थे। उस समय मंदिर के पुजारी के पास वर-कन्या आशीर्वाद लेने के लिए आये। मंदिर के पुजारी ने दक्षिणा ली एवं वर-कन्या को आशीर्वाद दियेः

“जुग जुग जियो… जुग जुग जियो।”

वर-कन्या के साथ आये हुए दूसरे कुटुम्बियों ने भी पुजारी को प्रणाम किया। उन लोगों को भी पुजारी ने ऐसे ही आशीर्वाद दियेः

“जुग जुग जियो… जुग जुग जियो।”

फिर, जहाँ ब्रह्मज्ञानी संत सुथरा बाबा बैठे थे उनके पास जाकर मिठाई की पेटी रखने के लिए पुजारी ने उन लोगों को कहा और उनके आशीर्वाद लेने के लिए प्रेरणा दी। वे लोग सुथरा बाबा के पास गये। पहले दूल्हे ने पैर छूकर आशीर्वाद माँगे तो संत ने कहाः

“तू मर जायेगा।”

फिर कन्या ने प्रणाम किये तो कहाः

“तू भी मर जायेगी।”

उन लोगों के माँ-बाप ने प्रणाम किये तो कहाः

“तुम लोग भी मर जाओगे।”

माँ-बाप तुरन्त ही घबराकर बोलेः “महाराज ! आप यह क्या कहते हैं ! उन पुजारी ने तो जुग-जुग जीने का आशीर्वाद दिया और आपने हमें मर जाने का आशीर्वाद दिया। ऐसा क्यों?”

सुथरा बाबा बोलेः

“झूठ बोलने का काम मुल्ला-मौलवियों एवं पंडित-पुजारियों का है। हम तो सच्ची बात बताते हैं कि सबकी मृत्यु अनिवार्य है। तुम लोग कभी-न-कभी मर जाओगे इसलिए सावधानी से जियो। ‘जुग जुग जियो’ का आशीर्वाद देने वाले खुद ही जुग जुग जीनेवाले नहीं हैं तो तुम क्या जुग जुग जियोगे?”

हमेशा विवेक से जियो। विवेक से विचारो कि कब तक जियेंगे। विवेक होगा तो वैराग्य आयेगा। वैराग्य के कारण मोक्ष पाने की इच्छा होगी। मुफ्त के ‘जुग जुग जियो’ के आशीर्वाद से कुछ नहीं होगा। मनुष्य का जीवन भोग-विलास के लिए नहीं है। प्रत्येक मनुष्य को हमेशा अपनी मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। संसार के बन्धनों एवं विषय-विकारों के बन्धनों से छूटने का यत्न करना चाहिए। जैसी भावना करोगे वैसा यत्न करोगे। जैसा यत्न करोगे वैसा संग मिलेगा। जैसा संग मिलेगा वैसा रंग लगेगा और जैसा रंग लगेगा वैसा भविष्य बनेगा। अतः ईश्वर एवं मृत्यु को कभी भी भूलना नहीं चाहिए वरन् सावधान रहना चाहिए।

हरि सम जग कछु वस्तु नहींमोक्ष पंथ सम पंथ।

सदगुरु सम सज्जन नहींगीता सम नहीं ग्रंथ।।

सच्चे संत-महात्मा ही लोगों को कड़वा सत्य बता सकते हैं और जीवन जीने का सच्चा रास्ता बताते हैं। सच्चे अर्थों में वे महापुरुष ही समाज के सच्चे हितै